— जब स्वच्छता काग़ज़ों में चमकती है और ज़मीन पर दम तोड़ती है
शहरों की रैंकिंग जब उत्सव बन जाए और सवाल पूछना अपराध, तो समझ लेना चाहिए कि स्वच्छता नहीं — सिर्फ प्रचार साफ़ किया जा रहा है।
अयोध्या को वर्ष 2024–25 के स्वच्छ सर्वेक्षण में देश में 28वाँ स्थान मिलने की घोषणा बड़े गर्व, ढोल-नगाड़ों और सरकारी बयानों के साथ की गई। नगर निगम ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। सोशल मीडिया से लेकर सभाओं तक यह संदेश दिया गया कि अयोध्या अब स्वच्छता की मिसाल बन चुकी है।
लेकिन सवाल यह है —
क्या अयोध्या वाकई उतनी स्वच्छ है, जितनी बताई जा रही है? और अगर है, तो फिर सूचना सार्वजनिक करने से डर क्यों?
RTI के सवाल और जवाब से भागता प्रशासन
एक जागरूक नागरिक के रूप में मैंने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत नगर निगम अयोध्या से यह जानना चाहा कि:
- 2017 से 2025 तक अयोध्या की स्वच्छ सर्वेक्षण में वास्तविक रैंकिंग क्या रही?
- हर वर्ष के अंक, मूल्यांकन मापदंड और प्रमाणपत्र क्या हैं?
- टॉप–10 में कभी न आ पाने के पीछे कमियाँ और प्रशासनिक विफलताएँ क्या रहीं?
- क्या इस पर कभी कोई आंतरिक ऑडिट या समीक्षा रिपोर्ट बनी?
यह सवाल किसी को बदनाम करने के लिए नहीं थे, बल्कि सार्वजनिक धन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यटन से जुड़े शहर की सच्चाई जानने के लिए थे।
नगर निगम ने जवाब दिया —
हाँ, 2024–25 में अयोध्या 28वें स्थान पर है।
हाँ, ODF++ और GFC 3-स्टार रेटिंग मिली है।
लेकिन जब पूछा गया कि: “पिछले 8 वर्षों में टॉप–10 में न आ पाने के कारणों पर कोई आंतरिक मूल्यांकन हुआ या नहीं?”
तो जवाब था —“नहीं।”
यानी आठ वर्षों तक:
- कोई आत्ममंथन नहीं
- कोई विफलता विश्लेषण नहीं
- कोई सुधारात्मक रिपोर्ट नहीं
फिर सवाल उठता है —
28वीं रैंक आई कैसे? और किस आधार पर?
राज्य सूचना आयोग में मामला लंबित, फिर भी अधूरी सूचना
मेरी RTI के जवाब अधूरे और भ्रामक पाए गए। प्रमाणपत्रों की प्रतियां नहीं दी गईं। मूल्यांकन के बिंदु छुपाए गए। मजबूर होकर यह मामला अब राज्य सूचना आयोग, लखनऊ में विचाराधीन है।
फिर भी, जब मामला आयोग में लंबित है, जब सूचना पूरी नहीं दी गई है, तो नगर निगम द्वारा जनता के बीच रैंकिंग का जश्न क्यों मनाया जा रहा है? क्या यह सूचना के अधिकार का अपमान नहीं है?
अगर सब ठीक है, तो डेटा छुपाने में डर क्यों?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
अगर अयोध्या सच में स्वच्छ है, अगर रैंकिंग ईमानदार है, अगर व्यवस्थाएँ दुरुस्त हैं, तो फिर:
- डिटेल्ड स्कोर कार्ड सार्वजनिक क्यों नहीं?
- वार्डवार स्वच्छता रिपोर्ट क्यों नहीं?
- सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति का ऑडिट क्यों नहीं?
महापौर और नगर आयुक्त को यह बताना चाहिए कि जनता से जानकारी छुपाने का कारण क्या है?
पर्यटन का शहर, लेकिन प्रसाधन का संकट
आज अयोध्या पर्यटकों से भरी है। सरकार गारंटी देती है कि यहाँ स्वच्छता सर्वोच्च प्राथमिकता है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि:
- सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति बदहाल है
- व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, मॉल और दुकानों में जहाँ मानक के अनुसार प्रसाधन होने चाहिए — वहाँ नगर निगम के पास कोई सूची तक नहीं है
- महिलाओं के लिए यह समस्या और भी भयावह है
आरती की कहानी — जो किसी एक की नहीं
बजाजा और चौक क्षेत्र में काम करने वाली आरती और ममता (नाम परिवर्तित) बताती हैं-
“मैं एक साधारण दुकान पर काम करती हूँ। जिस दुकान में नौकरी है, वहाँ नियम के अनुसार प्रसाधन होना चाहिए, लेकिन वर्षों से हमें प्रसाधन के लिए पानी की टंकी के नीचे बने शौचालय तक जाना पड़ता है।” जिसकी गन्दगी और गैर पुरुषों के बीच…..
यह सिर्फ आरती की कहानी नहीं है। यह अयोध्या की सैकड़ों कामकाजी महिलाओं की मजबूरी है।
क्या यही 28वीं रैंक की सच्चाई है?
रिकाबगंज से चौक — नालियाँ ही सहारा
रिकाबगंज से चौक जाते समय, सतगुरु सर्राफा की गली में एक अनधिकृत मूत्रालय वर्षों से चल रहा था।
स्थानीय लोगों ने विरोध किया —
क्योंकि:
- वहाँ से महिलाएँ गुजरती थीं
- संक्रमण और जानलेवा बीमारियों का खतरा था
आख़िरकार वह हटाया गया। लेकिन अब क्या हुआ?
जो पुरुष वहाँ प्रसाधन के लिए आते थे, उन्हें अब मजबूरी में मस्जिद के बगल वार्ड शिवा जी मुकेरी टोला की नालियों का सहारा लेना पड़ रहा है।
यह दृश्य:
- स्वच्छता की विफलता है
- प्रशासनिक शिथिलता का प्रमाण है
- और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खुला खतरा है
प्रश्न जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए
- क्या नगर निगम के पास उन सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की सूची है जहाँ प्रसाधन अनिवार्य हैं?
- कितने पर कार्रवाई हुई?
- महिलाओं के लिए सुरक्षित प्रसाधन की योजना क्या है?
- क्या नालियों को “वैकल्पिक शौचालय” मान लिया गया है?
- क्या यही मॉडल स्वच्छ सर्वेक्षण को दिखाया गया?
स्वच्छता रैंकिंग पर गंभीर प्रश्न
जब:
- गंदगी गलियों में दिखती है
- नालियाँ शौचालय बन चुकी हैं
- महिलाएँ अपमान और असुरक्षा झेल रही हैं
- RTI में जानकारी छुपाई जा रही है
तो फिर 28वीं रैंक का शोर किस लिए?
क्या यह रैंक:
- शहर की सच्चाई दिखाती है या
- सिर्फ फाइलों की सफाई?
RTI Act 2005: सिर्फ काग़ज़ नहीं, जनता की ताकत
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 सरकार की कृपा नहीं — नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
जब:
- जवाब दबाव में दिए जाएँ
- सूचना भ्रामक हो
- और सच्चाई छुपाई जाए
तो यह केवल एक RTI का नहीं, लोकतंत्र का मामला बन जाता है।
अंतिम सवाल — यक्ष प्रश्न
आज अयोध्या का हर नागरिक जानता है- “हमारी गलियाँ कितनी साफ़ हैं।” फिर सवाल यह है:
जब स्वच्छता इतनी शानदार है, तो सच सार्वजनिक करने में इतनी परेशानी क्यों?
यह मामला अब राज्य सूचना आयोग, लखनऊ में विचाराधीन है, और जल्द ही इस पर फैसला आएगा। तब तय होगा कि:
- स्वच्छता का शोर सच था या
- सच्चाई पर डाली गई धूल।
लेखक परिचय:
अभिषेक सावंत सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अयोध्या में शिक्षा, साक्षरता, नागरिक अधिकार और जन-जागरूकता से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
(यह लेख जनहित में स्वतंत्र पुनर्प्रकाशन हेतु उपलब्ध है।)