साक्षर अयोध्या की ओर एक नागरिक पहल

Student in Class

अयोध्या केवल एक धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी नहीं है, बल्कि यह वह भूमि है जहाँ समाज, विचार और चेतना ने सदियों से दिशा पाई है। आज जब अयोध्या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन चुकी है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या इस पहचान के साथ-साथ हम अपने समाज को शैक्षिक रूप से भी उतना ही सशक्त बना पा रहे हैं।

विकास केवल इमारतों, सड़कों और आयोजनों से नहीं मापा जा सकता। किसी भी जनपद का वास्तविक विकास उसकी साक्षरता दर, शैक्षिक गुणवत्ता और नागरिक जागरूकता से तय होता है। यदि समाज शिक्षित और जागरूक है, तो वह अपने अधिकारों की रक्षा भी करता है और अपने कर्तव्यों का निर्वहन भी। इसी सोच के साथ 15 जनवरी 2026 से अयोध्या जनपद में एक साक्षरता एवं जवाबदेही अभियान की शुरुआत की जा रही है, जिसका उद्देश्य अयोध्या को साक्षरता के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के अग्रणी जनपदों में स्थापित करना है।

यह अभियान किसी राजनीतिक मंच या संगठन का नहीं है। यह एक नागरिक पहल है, जो इस विश्वास पर आधारित है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार बिना समाज की भागीदारी के संभव नहीं है

साक्षरता का अर्थ: केवल अक्षर ज्ञान नहीं

हम अक्सर साक्षरता को केवल पढ़ने-लिखने की क्षमता तक सीमित कर देते हैं। लेकिन वास्तविक साक्षरता इससे कहीं आगे की अवधारणा है। एक साक्षर नागरिक वह है जो—

  • यह जानता है कि उसके बच्चे को शिक्षा का अधिकार है
  • सरकारी योजनाओं और कानूनों की मूल भावना को समझता है
  • विद्यालय और प्रशासन से संवाद करने का आत्मविश्वास रखता है
  • और आवश्यकता पड़ने पर सवाल पूछने से नहीं डरता

जब समाज इस स्तर तक साक्षर होता है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है और प्रशासन जवाबदेह बनता है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम: एक मजबूत कानून, अधूरा क्रियान्वयन

भारत में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE) बच्चों के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इस कानून के तहत निजी मान्यता प्राप्त विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित की गई हैं। उद्देश्य स्पष्ट है—सामाजिक असमानता को कम करना और हर बच्चे को समान अवसर देना। लेकिन सवाल यह है कि यह कानून ज़मीनी स्तर पर कितनी प्रभावशीलता के साथ लागू हो रहा है।

आज भी समाज में यह चर्चा आम है कि—

  • कई पात्र बच्चों को प्रवेश नहीं मिल पाता
  • कुछ अभिभावकों से अप्रत्यक्ष रूप से शुल्क वसूली की शिकायतें आती हैं
  • और निरीक्षण व निगरानी की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं दिखती

इन सवालों के उत्तर केवल धारणाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और अभिलेखों से मिलने चाहिए।

सूचना का अधिकार: नागरिक का सबसे मजबूत औज़ार

लोकतंत्र में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI) नागरिक को वह शक्ति देता है, जिससे वह शासन और प्रशासन से जवाब मांग सके। यह कानून केवल सूचना प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की बुनियाद है।

इसी अधिकार का प्रयोग करते हुए 16 नवंबर 2025 को बेसिक शिक्षा अधिकारी, अयोध्या के कार्यालय में एक विस्तृत RTI आवेदन प्रस्तुत किया गया। इस आवेदन का उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाना नहीं था, बल्कि यह जानना था कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम वास्तव में कैसे लागू हो रहा है।

RTI के माध्यम से जिन सूचनाओं की मांग की गई, वे पूरी तरह अभिलेखीय थीं और कानून के अनुसार विभागीय रिकॉर्ड में उपलब्ध होनी चाहिए थीं।

RTI के अंतर्गत मांगी गई प्रमुख जानकारियाँ

  • पिछले तीन शैक्षणिक वर्षों में RTE 25% कोटे के अंतर्गत हुए कुल प्रवेशों का वर्षवार रिकॉर्ड
  • RTE प्रवेश-अस्वीकृति और शुल्क वसूली से संबंधित प्राप्त शिकायतों का विवरण
  • इन शिकायतों पर की गई विभागीय कार्रवाई के आदेश और अभिलेख
  • RTE अनुपालन हेतु किए गए निरीक्षणों और निरीक्षण रिपोर्ट का रिकॉर्ड
  • जनपद अयोध्या में संचालित निजी मान्यता प्राप्त विद्यालयों की अद्यतन संख्या और सूची
  • RTI अधिनियम की धारा 2(j) के तहत अभिलेखों के निरीक्षण की सुविधा

ये सभी सूचनाएँ न केवल RTI के दायरे में आती हैं, बल्कि धारा 4(1)(b) के अनुसार इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित भी किया जाना चाहिए।

जवाब का अभाव: प्रशासनिक चुप्पी और बढ़ते सवाल

RTI अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान है कि आवेदन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य है। लेकिन निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बावजूद बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय की ओर से कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ

इसके बाद विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत प्रथम अपील के रूप में मामला जिलाधिकारी कार्यालय, अयोध्या के समक्ष प्रस्तुत किया गया। दुर्भाग्यवश वहाँ से भी नियत समय में कोई निर्णय या सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई

यह स्थिति केवल एक नागरिक के अधिकार का हनन नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यसंस्कृति पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। जब सूचना समय पर नहीं दी जाती, तो स्वाभाविक रूप से संदेह उत्पन्न होता है और अविश्वास बढ़ता है।

राज्य सूचना आयोग: संवैधानिक रास्ता

RTI अधिनियम केवल सूचना मांगने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक को अपील और शिकायत का अधिकार भी देता है। चूँकि प्रथम अपील स्तर पर भी कोई उत्तर नहीं मिला, इसलिए यह प्रकरण अब राज्य सूचना आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

यह कदम किसी टकराव या संघर्ष की भावना से नहीं, बल्कि इस उद्देश्य से उठाया जा रहा है कि—

  • कानून का पालन सुनिश्चित हो
  • सूचना का अधिकार प्रभावी बने
  • और व्यवस्था में आवश्यक सुधार हो

अभियान का स्वरूप: आरोप नहीं, समाधान

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि 15 जनवरी 2026 से शुरू होने वाला यह अभियान किसी विभाग, अधिकारी या विद्यालय के विरुद्ध नहीं है। यह अभियान समाधान-केंद्रित है।

अभियान का मूल विचार यह है कि साक्षरता दर तभी बेहतर हो सकती है, जब—

  • अभिभावक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों
  • विद्यालयों को स्पष्ट और सहयोगात्मक व्यवस्था मिले
  • और प्रशासन की भूमिका पारदर्शी व सक्रिय हो

विद्यालयों की चुनौतियाँ भी होंगी सामने

अक्सर चर्चा केवल इस बात पर केंद्रित हो जाती है कि विद्यालय RTE का पालन कर रहे हैं या नहीं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई निजी विद्यालय RTE का पालन करना चाहते हैं, परंतु उन्हें भी कई व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इनमें प्रमुख हैं—

  • अनुदान/भुगतान में देरी
  • प्रक्रियागत जटिलताएँ
  • निरीक्षण व्यवस्था की अस्पष्टता

यह अभियान उन विद्यालयों की समस्याओं को भी सामने लाएगा, ताकि शिक्षा व्यवस्था को एकतरफा नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण से समझा जा सके।

जनसंवाद: समाज के बीच जाएगा अभियान

यह अभियान फाइलों और कार्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा। 15 जनवरी 2026 से यह अभियान—

  • अभिभावकों से सीधे संवाद करेगा
  • बच्चों की शिक्षा से जुड़ी जमीनी समस्याओं को समझेगा
  • और समाज को यह बताएगा कि शिक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व है

जब समाज शिक्षा को प्राथमिकता देता है, तभी साक्षरता दर में वास्तविक सुधार संभव होता है।

साक्षरता और लोकतंत्र का संबंध

एक साक्षर समाज—

  • सवाल पूछता है
  • जवाब मांगता है
  • और लोकतंत्र को मजबूत बनाता है

यदि अयोध्या को वास्तव में एक आदर्श जनपद बनाना है, तो शिक्षा को विकास के केंद्र में रखना होगा। मंदिर, सड़क और भवन आवश्यक हैं, लेकिन शिक्षित नागरिक किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

पत्रकारों और समाज से अपील

यह लेख किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक सामूहिक सोच की अभिव्यक्ति है। यह लेख—

  • पत्रकारों के लिए स्वतंत्र उपयोग हेतु उपलब्ध है
  • किसी भी समाचार, विश्लेषण या संपादकीय में उद्धृत किया जा सकता है
  • और इसका उद्देश्य केवल यह है कि शिक्षा और साक्षरता का विषय सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आए

साक्षर अयोध्या, सशक्त अयोध्या

अयोध्या का भविष्य केवल उसके अतीत से नहीं तय होगा, बल्कि इस बात से तय होगा कि वह अपनी आने वाली पीढ़ियों को कितना शिक्षित और जागरूक बना पाती है। साक्षर अयोध्या ही सशक्त अयोध्या बन सकती है—एक ऐसी अयोध्या जहाँ हर बच्चा शिक्षा से जुड़ा हो, हर अभिभावक जागरूक हो और हर संस्था जवाबदेह हो।

15 जनवरी 2026 से शुरू होने वाला यह अभियान उसी दिशा में एक ईमानदार प्रयास है। बदलाव एक दिन में नहीं आता, लेकिन सही दिशा में उठाया गया हर कदम भविष्य की नींव रखता है।

लेखक परिचय:
अभिषेक सावंत सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अयोध्या में शिक्षा, साक्षरता, नागरिक अधिकार और जन-जागरूकता से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।

(यह लेख जनहित में स्वतंत्र पुनर्प्रकाशन हेतु उपलब्ध है।)