क्या किसी बच्चे का भविष्य उस ज़मीन की हालत तय करती है, जिस पर उसका घर खड़ा है?
क्या शिक्षा का अधिकार किसी कॉलोनी के नाम से तय होता है?
क्या संविधान ने कहीं लिखा है कि “स्वच्छ” क्षेत्रों के बच्चों को ही स्कूल मिलेगा और जिनके मोहल्लों पर सरकारी फाइलों में मलिन की मोहर लग चुकी है, उनके बच्चों के लिए शिक्षा सिर्फ़ दया, भिक्षा या स्वयंसेवियों की मेहरबानी होगी?
अगर ऐसा है, तो फिर हम संविधान नहीं, एक सामाजिक जाति-प्रणाली चला रहे हैं — फर्क सिर्फ़ इतना है कि यहाँ जाति का नाम इलाका रख दिया गया है।
आज जब सरकारें शिक्षा सुधार के नाम पर योजनाओं का ऐसा पिटारा खोल रही हैं कि उसे गागर में सागर कहा जा सकता है, तब सवाल यह है कि उसी गागर से कुछ बूँदें उन बच्चों तक क्यों नहीं पहुँच रहीं, जिन्हें हम और आप “मलिन बस्ती” का बच्चा कहकर संबोधित करते हैं?
आख़िर कौन तय करता है कि कोई बस्ती मलिन है?
किस शासनादेश, किस अधिसूचना, किस क़ानूनी परिभाषा के तहत किसी इलाके को मलिन कहा जाता है?
और उससे भी बड़ा प्रश्न — क्या उस शब्द के साथ वहाँ पैदा होने वाला हर बच्चा भी मलिन मान लिया जाता है?
मैंने यह सवाल सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पूछा है।
जवाब आया — या यूँ कहें, जवाब नहीं आया।
फाइलें चुप हैं।
अधिकारियों के पास कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है कि शिक्षा के द्वार पर खड़े बच्चे को “मलिन” कहकर पीछे हटाने का अधिकार उन्होंने किस कानून से पाया।
शब्द की हिंसा : ‘मलिन’
“मलिन” शब्द सिर्फ़ एक विशेषण नहीं है, यह एक मानसिक सज़ा है। यह शब्द बच्चे के माथे पर वह अदृश्य ठप्पा लगा देता है, जो स्कूल के गेट तक पहुँचने से पहले ही उसे अयोग्य घोषित कर देता है।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने कहा था—
“यह दाग़ दाग़ उजाला, यह शब-गज़ीदा सहर”, हमारी शिक्षा व्यवस्था का उजाला भी कुछ ऐसा ही है — दाग़दार, अधूरा और चुनिंदा।
क्या कोई बच्चा जन्म से मलिन होता है?
क्या उसकी आँखों में सपने किसी कॉलोनी की नालियों से होकर आते हैं?
क्या उसकी बुद्धि की क्षमता उस झोपड़ी की छत से तय होती है, जिसके नीचे वह सोता है?
अगर नहीं, तो फिर “मलिन बस्ती” शब्द को अब बदला जाना चाहिए। क्योंकि शब्द सोच बनाते हैं, और सोच नीतियाँ।
अयोध्या : आस्था की नगरी, सवालों की बस्ती
अयोध्या — जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आदर्श हमें समानता, करुणा और न्याय सिखाता है। उसी अयोध्या में आज लगभग 13 बस्तियाँ ऐसी हैं जिन्हें सरकारी भाषा में मलिन कहा जाता है।
इन बस्तियों के बच्चे —
- समय पर RTE (शिक्षा का अधिकार) की जानकारी से वंचित रहते हैं
- सरकारी विद्यालयों में भी प्रवेश के लिए संघर्ष करते हैं
- निजी विद्यालय तो उनके लिए सपना भर हैं
यहाँ शिक्षा कोई अधिकार नहीं, बल्कि संघर्ष बन चुकी है।
और यह संघर्ष किसी अपराध के कारण नहीं, बल्कि सिर्फ़ एक शब्द के कारण है — मलिन।
असल सलाखें कहाँ हैं?
अक्सर कहा जाता है कि मलिन बस्तियों के लोग सामाजिक रूप से पीछे हैं, जागरूक नहीं हैं, मुख्यधारा से कटे हुए हैं।
लेकिन सच यह है कि असल सलाखों के पीछे वे लोग नहीं हैं। असल सलाखों के पीछे वह तंत्र है, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर शिक्षा की योजनाएँ तो बनाता है, पर उन गलियों तक नहीं जाता जहाँ बच्चे स्कूल के बजाय कचरा बीनते हैं।
गुलज़ार साहब ने लिखा था—
“बच्चे भीख माँगते हैं, हाथों में किताबें नहीं”
यह पंक्ति कविता नहीं, रिपोर्ट है।
टेंट के नीचे चलती उम्मीद
इन बस्तियों में अगर कहीं शिक्षा की लौ जल रही है, तो वह सरकार की योजनाओं से नहीं, बल्कि समाज की संवेदना से जल रही है।
एक टेंट के नीचे, कुछ स्वयंसेवक, कुछ सामाजिक संगठन, और एक असाधारण व्यक्ति — जिन्हें लोग “खाकी वाले गुरुजी” के नाम से जानते हैं।
पेशे से पुलिसकर्मी, पर आत्मा से शिक्षक।
उन्होंने एक दिन भिक्षा माँगते हुए एक बच्चे को देखा। देखा — और नज़र फेर नहीं ली। उसका पीछा किया, उसके घर तक पहुँचे, और वहीं से शुरू हुआ “अपना स्कूल”।
उन्होंने बच्चों को पढ़ाया, उन्हें स्कूलों में दाख़िला दिलाया, उन्हें सपने देखने की भाषा सिखाई। लेकिन सवाल यहीं आकर रुक जाता है।
क्या स्वयंसेवा व्यवस्था का विकल्प बन सकती है?
क्या कुछ नेक दिल लोगों की मेहनत उस खाई को पाट सकती है, जो व्यवस्था ने बनाई है? क्या स्वयंसेवकों के सहारे वह बच्चा उस शिक्षा की दौड़ में भाग पाएगा, जिसकी शुरुआती लाइन ही उसने देखी नहीं?
उच्च शिक्षा की छलांग लगाने से पहले प्राथमिक विद्यालय की पहली सीढ़ी ज़रूरी है। और वह सीढ़ी आज भी कई बच्चों के लिए बंद है।
एक माँ की गवाही
एक महिला — माँ — कहती है:
“पीढ़ियों से हम या तो कचरा बीनते आए हैं, या भीख माँगते हैं, या हमें वेश्यावृत्ति की तरफ़ धकेल दिया जाता है।
हम यह सब अपने बच्चों के लिए नहीं चाहते। इसलिए सामाजिक संगठनों का सहारा लेते हैं। यह वैसा ही है जैसे प्यासे को सूखे कुएँ में एक बूँद पानी का दिखना।”
यह बयान किसी समाजशास्त्रीय अध्ययन से ज़्यादा सच्चा है।
शिक्षा : बीज हर जगह, ज़मीन चुनिंदा
अज्ञेय ने लिखा था—
“बीज तो हर जगह अंकुरित हो सकता है, प्रश्न यह है कि उसे पानी कौन देगा।”
शिक्षा किसी एक वर्ग की बपौती नहीं।
वह किसी भी गली में जन्म ले सकती है।
लेकिन उसके लिए वह भ्रूण तैयार करना होगा,
जिसका पालक वही सरकारी तंत्र है,
जिसे हमने सरताज तो बना दिया,
पर ज़िम्मेदारी याद नहीं दिलाई।
अब सवाल सिर्फ़ शिक्षा का नहीं, सम्मान का है
“मलिन बस्ती” कहना बंद होना चाहिए। यह शब्द सिर्फ़ इलाकों को नहीं, इंसानों को अपमानित करता है।
अगर सरकार सच में सबका साथ, सबका विकास चाहती है, तो सबसे पहले शब्द बदलिए, फिर सोच बदलेगी, फिर नीति बदलेगी।
अंत में
हम वहाँ गए। हमने लोगों से बात की। समस्याएँ जटिल थीं, लेकिन रास्ता उतना कठिन नहीं था।
नज़ीर अकबराबादी ने कहा था—
“इल्म की राह में कांटे बहुत हैं, मगर यही कांटे ताज बनते हैं।”
सवाल यह है कि क्या हम उन कांटों को हटाने का साहस रखते हैं, या फिर अगली पीढ़ी को भी मलिन कहकर अंधेरे में छोड़ देंगे?
क्योंकि अंधेरा घना है,
लेकिन रोशनी बिखेरना मना नहीं है।
लेखक परिचय:
अभिषेक सावंत सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अयोध्या में शिक्षा, साक्षरता, नागरिक अधिकार और जन-जागरूकता से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
(यह लेख जनहित में स्वतंत्र पुनर्प्रकाशन हेतु उपलब्ध है।)