आँकड़ों से डरता सिस्टम और समाधान की तलाश, बीमारी नहीं, व्यवस्था असफल हो रही है
डेंगू को आज भी आमतौर पर एक मौसमी बीमारी के रूप में देखा जाता है। जैसे बरसात आई, वैसे ही डेंगू आ गया। कुछ समय में मामले बढ़े, अस्पतालों में भीड़ लगी और फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। लेकिन यह दृष्टिकोण ही सबसे बड़ी समस्या है। डेंगू कोई अचानक होने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की विफलता का परिणाम है।
अयोध्या जैसे ऐतिहासिक, धार्मिक और तेजी से विकसित हो रहे जनपद में हर वर्ष डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और डायरिया जैसी संक्रामक बीमारियों का फैलना इस बात का संकेत है कि स्वच्छता, निगरानी और आपसी समन्वय की प्रणाली में गंभीर कमियाँ हैं।
यह लेख डेंगू को केवल एक बीमारी के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक, सामाजिक और नागरिक चुनौती के रूप में देखता है।
डेंगू का सच: इलाज नहीं, रोकथाम ही उपाय
डेंगू को लेकर सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसका कोई सीधा इलाज नहीं है। इलाज के नाम पर केवल लक्षणों का प्रबंधन किया जाता है। प्लेटलेट्स, तरल पदार्थ और निगरानी – यही चिकित्सा की सीमा है।
यदि कोई वास्तविक “दवा” है, तो वह है:
- स्वच्छता
- जल जमाव की रोकथाम
- मच्छरों के प्रजनन स्थलों का नाश
- समय रहते पहचान और कार्रवाई
यानी डेंगू अस्पताल में नहीं, मोहल्लों और गलियों में रोका जाता है।
सरकारी दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
हर वर्ष सरकारी रिपोर्टों में यह बताया जाता है कि:
- फॉगिंग कराई गई
- एंटी-लार्वा स्प्रे किया गया
- जागरूकता अभियान चलाया गया
लेकिन सवाल यह है कि:
- अगर सब कुछ हो रहा है, तो हर साल केस क्यों बढ़ते हैं?
- अगर निगरानी है, तो अचानक अस्पताल क्यों भर जाते हैं?
इसका सीधा अर्थ है कि या तो:
- कार्य कागज़ों में हो रहा है या
- कार्य बिना डेटा और रणनीति के हो रहा है
दोनों ही स्थितियाँ खतरनाक हैं।
सूचना का अधिकार और पारदर्शिता की परीक्षा
इसी पृष्ठभूमि में जिला चिकित्सालय, अयोध्या के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत एक आवेदन किया गया। उद्देश्य केवल यह जानना था कि:
- पिछले तीन वर्षों में संक्रामक रोगों की स्थिति क्या रही
- निगरानी की प्रणाली कैसे काम कर रही है
- नगर निगम और प्रशासन को समय पर सूचना दी जा रही है या नहीं
RTI में माँगी गई जानकारी किसी व्यक्ति विशेष से जुड़ी नहीं थी, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित आँकड़े थे। लेकिन जब इन सवालों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया, तो यह केवल सूचना न देने का मामला नहीं रहा। यह प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल बन गया।
जवाब न देना: एक गंभीर संकेत
RTI का जवाब न मिलना कई आशंकाएँ पैदा करता है:
- क्या वार्ड या ग्राम स्तर पर डेटा संकलित ही नहीं किया जाता?
- क्या Disease Surveillance केवल नाम का है?
- क्या नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग के बीच सूचनाओं का आदान–प्रदान नहीं होता?
यदि जवाब मौजूद हैं, तो उन्हें देने में संकोच क्यों? और यदि जवाब मौजूद नहीं हैं, तो यह स्वीकार करना भी आवश्यक है। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है, जब प्रशासन सवालों से बचने लगे।
Disease Surveillance Cell: नाम है, काम?
कागज़ों में Disease Surveillance Cell या Monitoring Team का उल्लेख मिलता है। लेकिन ज़मीनी सवाल यह है कि:
- क्या यह सेल सक्रिय रूप से काम कर रही है?
- क्या यह केवल रिपोर्ट तैयार करती है या कार्रवाई भी सुनिश्चित करती है?
- क्या इसके निष्कर्षों के आधार पर किसी क्षेत्र विशेष में त्वरित कदम उठाए जाते हैं?
यदि यह सेल केवल फाइलों तक सीमित है, तो इसका कोई व्यावहारिक लाभ नहीं।
एक प्रभावी Disease Surveillance Cell को:
- बीमारी के फैलाव के पैटर्न को समझना होगा
- हॉटस्पॉट की पहचान करनी होगी
- नगर निगम को स्पष्ट निर्देश देने होंगे
क्षेत्रवार डेटा क्यों ज़रूरी है?
डेंगू पूरे जिले में समान रूप से नहीं फैलता। यह कुछ इलाकों में ज्यादा और कुछ में कम होता है। इसलिए इलाके-आधारित डेटा सबसे महत्वपूर्ण है।
यदि यह पता हो कि:
- किस वार्ड से सबसे ज्यादा मरीज आ रहे हैं
- किस ग्राम सभा में बार-बार केस सामने आ रहे हैं
तो उसी क्षेत्र में:
- विशेष सफाई अभियान
- अतिरिक्त फॉगिंग
- घर-घर जागरूकता
चलाई जा सकती है।
बिना क्षेत्रवार डेटा के किया गया कार्य अंधेरे में तीर चलाने जैसा है।
स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम: अलग–अलग क्यों?
संक्रामक रोग न तो स्वास्थ्य विभाग की सीमा में रुकते हैं और न ही नगर निगम की। फिर भी व्यवहार में दोनों विभाग अक्सर अलग-अलग काम करते दिखाई देते हैं। स्वास्थ्य विभाग मरीजों का इलाज करता है। नगर निगम सफाई करता है। लेकिन दोनों के बीच डेटा आधारित समन्वय नहीं दिखता। यदि स्वास्थ्य विभाग समय पर नगर निगम को यह न बताए कि:
- कौन सा इलाका प्रभावित है, तो नगर निगम कैसे प्रभावी सफाई करेगा?
यह समन्वय न होना ही डेंगू को बढ़ावा देता है।
जनता की भूमिका: केवल दर्शक नहीं
डेंगू नियंत्रण को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानना भी एक भूल है। जब तक जनता इसमें भागीदार नहीं बनेगी, तब तक कोई भी मॉडल सफल नहीं होगा।
स्थानीय नागरिक:
- अपने इलाके की समस्याओं को सबसे अच्छी तरह जानते हैं
- यह पहचान सकते हैं कि कहाँ पानी जमा रहता है
- कहाँ सफाई नहीं होती
यदि इन्हें Disease Surveillance प्रक्रिया में शामिल किया जाए, तो निगरानी कई गुना प्रभावी हो सकती है।
“मेरा मॉडल, मेरी अयोध्या”: एक नागरिक दृष्टिकोण
“मेरा मॉडल, मेरी अयोध्या” का मूल विचार यही है कि:
- नागरिक केवल शिकायतकर्ता न बनें
- बल्कि समाधान का हिस्सा बनें
इस मॉडल के तहत:
- वार्ड और ग्राम स्तर पर नागरिक समितियाँ
- Disease Surveillance Cell में जन प्रतिनिधित्व
- डेटा की सार्वजनिक उपलब्धता
जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। यह मॉडल किसी के विरोध में नहीं, बल्कि अयोध्या के हित में है।
क्या डेंगू मुक्त अयोध्या संभव है?
उत्तर है – हाँ, बिल्कुल संभव है।
लेकिन इसके लिए:
- आँकड़ों से डर छोड़ना होगा
- पारदर्शिता अपनानी होगी
- विभागीय अहंकार से ऊपर उठना होगा
- जनता को साझेदार बनाना होगा
डेंगू मुक्त अयोध्या कोई नारा नहीं, बल्कि एक सुविचारित प्रक्रिया है।
…सवाल आज भी खड़े हैं
आज भी RTI के सवाल वहीं हैं। आज भी जवाब का इंतज़ार है। लेकिन सवाल पूछना बंद नहीं होगा, क्योंकि:
- यह स्वास्थ्य का सवाल है
- यह जीवन का सवाल है
डेंगू से लड़ाई केवल मच्छरों से नहीं, बल्कि अव्यवस्था और चुप्पी से भी है।
अब निर्णय हमें करना है – क्या हम हर साल डेंगू को सहन करेंगे, या अयोध्या को सच में डेंगू मुक्त बनाएँगे।
लेखक परिचय:
अभिषेक सावंत सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अयोध्या में शिक्षा, साक्षरता, नागरिक अधिकार और जन-जागरूकता से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
(यह लेख जनहित में स्वतंत्र पुनर्प्रकाशन हेतु उपलब्ध है।)