आज जब मैं अयोध्या के गुप्तारघाट पहुँचा, तो सरयू की लहरें अपने ही प्रश्न पूछती दिखीं। घाट पर चहल‑पहल थी—नावें थीं, ठेले थे, पूजा की थालियाँ थीं, और थीं वे माताएँ जिनकी आँखों में बच्चों के भविष्य का सपना तैर रहा था। उन्हीं आँखों में मैंने आज अमावस से पूर्णिमा तक का सफ़र देखा।
कुछ महिलाएँ बोलीं—“हमारे बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं।” उनकी आवाज़ में संतोष भी था और संकोच भी। फिर कुछ ने धीरे से कहा—“हम चाहते हैं कि बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ें, अच्छे स्कूल में जाएँ… लेकिन कमाई इतनी नहीं कि यह सोच भी सकें।” यह ‘सोच’ ही उनके लिए भारी थी।
जब उन्हें बताया गया कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत उनके बच्चों का दाख़िला अच्छे निजी स्कूलों में हो सकता है—और आठवीं तक की पढ़ाई पूरी तरह मुफ़्त—तो चेहरों पर जो रोशनी फैली, वह किसी दीपोत्सव से कम नहीं थी।
एक माँ ने कहा—“क्या सच में?”
और उसी ‘सच’ ने उनके मन के आँगन में वर्षों से दबी उमंगों को हवा दे दी।
“माँ जब बच्चे को समाज के आँगन में छोड़ती है,
तो अपने सपनों को उसके कंधों पर रख देती है।”
नाम बदलकर कही गई सच्चाई
कुछ महिलाओं और अभिभावकों ने नाम न छापने की शर्त पर जो कहा, वह अयोध्या ही नहीं—पूरे तंत्र के लिए सवाल है।
उन्होंने कहा—“हम हर चुनाव में वोट देते हैं। नगर निगम, विधानसभा, लोकसभा—सबमें। लेकिन कभी कोई जनप्रतिनिधि शिक्षा के अधिकार जैसे मुद्दे पर हमें जागरूक करने नहीं आया।”
वे पूछते हैं—हम और हमारे बच्चे क्या चाहते हैं?
अच्छी शिक्षा। बेहतर रोज़गार—या व्यवसाय। एक सुंदर घर। एक स्वच्छ, सुरक्षित शहर।
लेकिन सवाल वही—जब हम शिक्षित ही नहीं होंगे, तो यह सब कैसे संभव होगा?
यह सवाल किसी एक गली का नहीं, किसी एक घाट का नहीं—यह सवाल अयोध्या जनपद की आत्मा से जुड़ा है।
ठेलों और नावों के बीच दबा सपना
जब छोटे‑छोटे व्यवसाय करने वालों से बात की—ठेले वाले, नाविक, प्रसाद बेचने वाले—तो लगा जैसे हर किसी के भीतर एक अधूरा विद्यार्थी बैठा है।
वे कहते हैं—“अगर हमें समय पर शिक्षा का अधिकार मिला होता, तो शायद आज हम भी देश के विकास में किसी और रूप में योगदान दे रहे होते।”
दिन भर की मेहनत, नाव खींचना, ठेला लगाना—और ऊपर से बच्चों की पढ़ाई का खर्च।
“शिक्षा जब अधिकार से हटकर व्यापार बन जाए,
तो गरीब की मेहनत सबसे पहले गिरवी रखी जाती है।”
वे बताते हैं कि कैसे शिक्षा के व्यावसायीकरण का बोझ उनके कंधों पर चढ़ता चला गया—और अधिकार, काग़ज़ों में सिमटता गया।
आदित्य निषाद की आवाज़
पाँचवीं कक्षा का छात्र आदित्य निषाद—गुप्तारघाट के ही एक सरकारी विद्यालय में पढ़ता है। वह कहता है—“स्कूल में सुविधाएँ हैं। पढ़ाई भी होती है।”
लेकिन फिर वह ठहरकर कहता है—“मैं जिस स्तर तक जाना चाहता हूँ, वह यहाँ से मुश्किल लगता है।” आदित्य की यह बात किसी शिकायत की तरह नहीं थी—यह एक ईमानदार स्वीकारोक्ति थी। यह स्वीकारोक्ति हमें बताती है कि सरकारी स्कूलों में सुधार के साथ‑साथ RTE के प्रभावी क्रियान्वयन की ज़रूरत क्यों है।
पहले दिन की यात्रा, बड़ा सवाल
यह हमारी शिक्षा‑साक्षरता की यात्रा का पहला दिन था। पहले ही दिन यह साफ़ हो गया कि हर साल अयोध्या में हज़ारों बच्चों को बेहतर स्कूल मिल सकता है—अगर जागरूकता हो। लेकिन जागरूकता के अभाव में- बच्चे निजी स्कूलों की फ़ीस में दबते हैं, माता‑पिता कर्ज़ में डूबते हैं, और अधिकार—फाइलों में बंद रहते हैं।
RTI में मौन और ज़मीन पर सन्नाटा
RTE को लेकर BSA अयोध्या की चुप्पी—RTI में मौन—सबसे बड़ा सवाल है। जब सूचना का अधिकार पूछता है— तो जवाब क्यों नहीं मिलता?
जब कानून कहता है— तो ज़मीन पर लागू क्यों नहीं होता? अयोध्या साक्षरता में प्रथम कैसे आएगी, जब विभागीय जिम्मेदारी सिर्फ़ फाइलों तक सीमित रहे?
“काग़ज़ों पर चमकती योजनाएँ,
धरातल पर क्यों मुरझा जाती हैं?”
यह लेख क्यों ज़रूरी है
यह लेख किसी आरोप का नहीं—अधिकार की याद दिलाने का प्रयास है। RTE कोई दान नहीं—संवैधानिक अधिकार है।
यह अधिकार हर उस माँ का है—
जो अपने बच्चे को बेहतर भविष्य देना चाहती है।
यह अधिकार हर उस पिता का है—
जो दिन‑रात मेहनत करता है, पर शिक्षा की फ़ीस से डरता है।
यह अधिकार हर उस बच्चे का है—
जो सपने देखता है, पर साधनों में बंधा है।
अंत में…
गुप्तारघाट पर आज सरयू बह रही थी—
और उसके किनारे सवाल।
अगर हमने इन सवालों को सुना, तो अयोध्या सिर्फ़ धार्मिक नहीं—शैक्षिक राजधानी भी बन सकती है।
अगर नहीं सुना, तो हर साल हज़ारों सपने घाट पर ही रह जाएँगे।
“शिक्षा से बड़ा कोई दान नहीं,
और अधिकार से बड़ा कोई हथियार नहीं।”
यह यात्रा जारी रहेगी। क्योंकि जब तक एक भी बच्चा अपने अधिकार से वंचित है—
तब तक पूर्णिमा अधूरी है।
लेखक परिचय:
अभिषेक सावंत सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अयोध्या में शिक्षा, साक्षरता, नागरिक अधिकार और जन-जागरूकता से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
(यह लेख जनहित में स्वतंत्र पुनर्प्रकाशन हेतु उपलब्ध है।)