आज जब मैं अयोध्या के गुप्तारघाट पहुँचा, तो सरयू की लहरें अपने ही प्रश्न पूछती दिखीं। घाट पर चहल‑पहल थी—नावें थीं, ठेले थे, पूजा की थालियाँ थीं, और थीं वे माताएँ जिनकी आँखों में बच्चों के भविष्य का सपना तैर रहा था। उन्हीं आँखों में मैंने आज अमावस से पूर्णिमा तक का सफ़र देखा। कुछ…